रवीश के ब्लाँग कस्बा में वो लिखते है कि आज दिल्ली मे माइक थेवर आ रहॆ है ओर जो उनसे मिलना चाहे वो दिल्ली के सांगरिला होटल में उनसे मिल सकता है। बात केवल इतनी सी थी, लेकिन एक ब्लाँगर ने जो कमेंन्ट्स रवीश पर किया उससे एक सोच का पता चलता है कि कैसे बहुत लोग अभी भी पुरानी मानसिक्ता मे जी रहे है ,यह वो लोग है जो हर तरफ़ सिर्फ़ अपनो को देखना चाहते है, वो नही सोचते कि समाज मे कोई बदलाव आये ।
यह भी सच है कि सभी लोग एक जैसे नहि होते, कुछ लोग अच्छे भी होते है जो समाज को गति देना पसंन्द करते है ओर रुड़ीवादिता मे विस्वास नही रखते ।
मुझे याद आता है कि कैसे जब मेने अपना कोर्स खत्म किया ओर मुझे कुछ ए़क्स्पीरियन्श कि जरुरत थी , मेने एक अखवार में वेकेन्शी देखी ,जो कि दिल्ली के लाजपत राय मार्केट में किसी कम्पनी के लिये थी । कम्पनी का आफ़िस भी कम्पनी कि तरह कोई बहुत बड़ा नही था , वहा इन्ट्र्व्यू चल रहे थे । इन्ट्र्व्य़ू कम्पनी का माळिक खुद ले रहा था । जब मेरा नम्बर आया तो मेनें अपना रिस्युम उसको दिया अपने बारे मे बताया, उसने मेरी नाँलेज देखी ओर वो सेटिस्फ़ाई नजर आया ।
उसके बाद उसने घुलनसील हो कर मुझसे पूछा कि आपका जो सर नेम हे वो लोग तो ब्राह्मिन होते है मेने इन्कार किया कि नही मै जाटव हु, उसके बाद उसका चेहरा देखने वाला था, अब तक जो मे सिलेक्ट हुआ मान रहा था ,उसने मुझे अचानक मुझे कहा ठीक हे हम आपको फ़ोन पर बता देन्गें अगर आप सिलेक्ट हे तो , वो फोन आज तक नही आया । सिर्फ़ मेरी कास्ट कि वजह से। उसके बाद मे अपनी कास्ट को कोसने लगा था लेकिन मुझे अपने टेलेन्ट पर विस्वास था ।
मुझे एक बड़ी कम्पनी में काम करने का मॊका मिला ,वहा मेरी कास्ट मुझसे नही पूछी गयी ओर आज मे कुशल व्यकि हुँ ।

रवीश कुमार का ब्लाँग पड़ा ,उसमे एक खबर थी जातिगत पूर्वाग्रह की एक और करतूत ,कि केसे एक सोसाइटि फ़्लॆट को बेचने के लिये एक महिला को सिर्फ़ इस लिये सोसाइटि के लोगो ने परेशान किया क्योकि वो अपने फ़्लॆट को एक मुस्लिम व्यक्ति को बेचना चाहती थी ।
यही हाल दिल्ली का है । मेरे इन्लाज को एक फ़्लॆट खरिदना था जो कि दिल्ली के पाड्व नगर मे एक बिल्डर फ़्लेट था । बेचने वाले कि पहली शर्त यह थी कि आपकी कास्ट ऊची होनी चाहिये वर्ना बाकि फ़्लॆट वाले उसको बेचने नही देंगे । हमे अपनी कास्ट को छुपा कर वो फ़्लॆट लेना पड़ा , मजबूरी थी क्योकि लोकेशन बहुत अच्छी थी ओर हम वो फ़्लॆट किसी भी कीमत पेर लेना चाहते थे । अखिर वो फ़्लॆट हमने खरीद लिया ओर उसको रेन्ट पर दे दिया ।
क्या एक आदमी को अपनी इच्छा से कही रहने का अधिकार भी नही है। हर जगह पर क्या जाति ही सबसे बड़ा अधिकार है ।
आखिर हम कब बड़े होंगे। अब तो बड़े हो जाओ ।

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