यही हाल दिल्ली की मैयर का भी है वो एन.डी.एम.सी. की सड़को के बारे में तो बात करती है लेकिन यह नही दिखाई देता कि बाकी दिल्ली कि सड़कॊ का क्या हाल है ।
इन दिनो दिल्ली में लूट्पाट ओर हत्याओ कि वारदात तेजी के साथ बड़ रही है हाल के कुछ दिनो में तो इन घट्नाओ के ग्राफ़ ने मंहगाई का रिकार्ड भी तोड़ कर रख दिया है । नेताओ ने महंगाई के लिये ओर पुलिस ने घट्नाओ के लिये बहाने खोज लिये है। नेता कहते हे कि हमारे देश कि जनता तरक्की कर रही है ओर उनका जिवन स्तर भी पहले से बेहतर हुआ है इस लिये जनता ज्यादा खाना खा रही है ,पता नही ये लोग देश कि तरक्की ले लिये गर्व कर रहे है या जनता को कोस रहे है, शुक्र हे इन्होने महंगाई कम करने के लिये जनता को कम खाने कि सलाह नही दी।
इसी तरह एन सी आर कि पुलिस के पास भी अपने तर्क है , वो कहते है कि आज कल प्राँपर्टी के दाम बेतहासा बड़ रहे है, लोगो के पास बहुत पैसा आ गया है इस लिये बारदाते भी बड़ रही है।
दिल्ली पुलिस का तो ओर भी बुरा हाल हें, दिल्ली पुलिस कहती हें कि अपराधी ,अपराध कर के साथ लगे राज्यॊ मे घुस जाते है ओर उनको ढूड्ना मुसकिल हो जाता है।
लेकिन नेताओ से लेकर पुलिस तक यह नही मानते कि उनके मैनेजमेंन्ट कि भी कमी हे । किस तरह नेताओ ओर पुलिस से जनता परेशान है इसके दो उदाहण मै आपको दे सकता हु ओर ये सच्ची घटना है ।
१ . पिछ्ले साल यमुनापार मे पटपड़गंज विधानसभा श्रेत्र के कल्याणपुरी इलाके में पानी की बहुत बड़ी समस्या थी लोग परेशान थे ,लोगो को लगा कि वो स्थानिये विधायक से मिल कर कोई रास्ता खोजें। लोग स्थानिये विधायक के पास गये ओर उनको अपनी समस्या बताई, लोगो ने विधायक को यह भी बताया कि वो सिर्फ़ वोट के लिये जनता के पास आते है , विधायक जी भ्ड़्क गये,बोले जाओ अब वोट दिया है अब मत देना ओर उनको वहा से चलता कर दिया । यही हाल सड़्क आदि का भी है कोई सुनने वाला नही।
२. दूसरी घट्ना में आज कि तारिख मे भी पुलिस कि सरपरस्ती मे गुन्डें फ़ल फ़ूल रहे है, दोनो का काम दिन दूनी चार चोगनी तरक्की पर है । स्थानिये गुन्डें पुलिस को पैसा पहुचाते है ओर बड़े आराम से लूट्पाट करते है , खुले आम जुआ,सट्टा,ड्रग्स आदि का काम चलता है लोकल लोगो से अगर आप बात करे तो आप को एक-एक जगह का पता बता देंगे कि कँहा क्या हो रहा है कौन-कौन लोग कहा-कहा पर किस समय लूट्पाट करते है, लेकिन पुलिस सोई हुई है, क्योकि उसे पता है कि कोइ अगर कमंप्लेट कराने आयेगा तो वो उसे बर्गला के भगा देंगे । आप वहा देख सकते है कि कैसे अपराधिओ का राज चल रहा है ।
जनता त्रस्त ओर पुलिस भ्रष्ट ।
रवीश के ब्लाँग कस्बा में वो लिखते है कि आज दिल्ली मे माइक थेवर आ रहॆ है ओर जो उनसे मिलना चाहे वो दिल्ली के सांगरिला होटल में उनसे मिल सकता है। बात केवल इतनी सी थी, लेकिन एक ब्लाँगर ने जो कमेंन्ट्स रवीश पर किया उससे एक सोच का पता चलता है कि कैसे बहुत लोग अभी भी पुरानी मानसिक्ता मे जी रहे है ,यह वो लोग है जो हर तरफ़ सिर्फ़ अपनो को देखना चाहते है, वो नही सोचते कि समाज मे कोई बदलाव आये ।
यह भी सच है कि सभी लोग एक जैसे नहि होते, कुछ लोग अच्छे भी होते है जो समाज को गति देना पसंन्द करते है ओर रुड़ीवादिता मे विस्वास नही रखते ।
मुझे याद आता है कि कैसे जब मेने अपना कोर्स खत्म किया ओर मुझे कुछ ए़क्स्पीरियन्श कि जरुरत थी , मेने एक अखवार में वेकेन्शी देखी ,जो कि दिल्ली के लाजपत राय मार्केट में किसी कम्पनी के लिये थी । कम्पनी का आफ़िस भी कम्पनी कि तरह कोई बहुत बड़ा नही था , वहा इन्ट्र्व्यू चल रहे थे । इन्ट्र्व्य़ू कम्पनी का माळिक खुद ले रहा था । जब मेरा नम्बर आया तो मेनें अपना रिस्युम उसको दिया अपने बारे मे बताया, उसने मेरी नाँलेज देखी ओर वो सेटिस्फ़ाई नजर आया ।
उसके बाद उसने घुलनसील हो कर मुझसे पूछा कि आपका जो सर नेम हे वो लोग तो ब्राह्मिन होते है मेने इन्कार किया कि नही मै जाटव हु, उसके बाद उसका चेहरा देखने वाला था, अब तक जो मे सिलेक्ट हुआ मान रहा था ,उसने मुझे अचानक मुझे कहा ठीक हे हम आपको फ़ोन पर बता देन्गें अगर आप सिलेक्ट हे तो , वो फोन आज तक नही आया । सिर्फ़ मेरी कास्ट कि वजह से। उसके बाद मे अपनी कास्ट को कोसने लगा था लेकिन मुझे अपने टेलेन्ट पर विस्वास था ।
मुझे एक बड़ी कम्पनी में काम करने का मॊका मिला ,वहा मेरी कास्ट मुझसे नही पूछी गयी ओर आज मे कुशल व्यकि हुँ ।
रवीश कुमार का ब्लाँग पड़ा ,उसमे एक खबर थी जातिगत पूर्वाग्रह की एक और करतूत ,कि केसे एक सोसाइटि फ़्लॆट को बेचने के लिये एक महिला को सिर्फ़ इस लिये सोसाइटि के लोगो ने परेशान किया क्योकि वो अपने फ़्लॆट को एक मुस्लिम व्यक्ति को बेचना चाहती थी ।
यही हाल दिल्ली का है । मेरे इन्लाज को एक फ़्लॆट खरिदना था जो कि दिल्ली के पाड्व नगर मे एक बिल्डर फ़्लेट था । बेचने वाले कि पहली शर्त यह थी कि आपकी कास्ट ऊची होनी चाहिये वर्ना बाकि फ़्लॆट वाले उसको बेचने नही देंगे । हमे अपनी कास्ट को छुपा कर वो फ़्लॆट लेना पड़ा , मजबूरी थी क्योकि लोकेशन बहुत अच्छी थी ओर हम वो फ़्लॆट किसी भी कीमत पेर लेना चाहते थे । अखिर वो फ़्लॆट हमने खरीद लिया ओर उसको रेन्ट पर दे दिया ।
क्या एक आदमी को अपनी इच्छा से कही रहने का अधिकार भी नही है। हर जगह पर क्या जाति ही सबसे बड़ा अधिकार है ।
आखिर हम कब बड़े होंगे। अब तो बड़े हो जाओ ।
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